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Hindi Blog Etiquettes....Commented (upon)

No matter how cool you find it, debates at Hindi Blogosphere are always HOT. It is no different this time. issue at stake is comments, remember the white space provided to you the readers here 9and very seldom used on this blog :(.  Bone of the contention is how important is it to give comments when either there is nothing in the post to comment on or you have no comment to offer. Though as a matter of fact many many many i.e. millions of blogs in English just don have comments, even the popular blogs are  comment less. But Hindi Blogosphere is a different world altogether. Back_scratcher

Links First

समीरलाल की उड़नतश्‍तरी पर : Sameer advocates comments even for the sake of it.
राजीव टंडन के अंतरिम पर : Comment only if you have something to comment on.

ज्ञान दत्त जी मानसिक हलचल पर : Women get more comments...thats not fair.

शास्त्री जे सी फिलिप जी के सारथी पर : Comment you must, it encourages.

टिप्पणीकार पर : comments on post on comments :)

संजय तिवारी जी के विस्फोट पर comment pleeeeeeeeeeeeeeez


कुछ पुराने जमाने की बातें:


उड़न तश्तरी पर : अपना ब्लॉग बेचो रे भाई

फुरसतिया पर: सुभाषित वचन-ब्लाग, ब्लागर, ब्लागिंग

जीतू भाई: ब्लाग पर टिप्पणी का महत्व

उड़न तश्तरी पर: पुनि पुनि बोले संत समीरा

सागर चन्द नहार जी: अपने ब्लाग की टी आर पी कैसे बढ़ायें

नोटपैड पर: तू मेरी पीठ खुजा मैं तेरी पीठ खुजाऊँ


I earlier wrote that once a while one must write without bothering the numbers, just for oneself.

 

Well in the light of above I can only say that debate is far from over, this (mutual back-scratching) will continue.

 

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5 comments

  1. Shastri JC Philip  

    11:13 AM

    I read your blog only today. Good work!

    Also, this article should be part of the list I compiled, so I will be adding it to the bibliography in my टिप्पणी: एक सेमीफायनल चर्चा 001

    Shastri

  2. Raji Chandrasekhar  

    7:30 PM

    हेलॊ जी
    मैँ केरल से हूँ। मलयालम में ब्लोग कर रहा हूँ।
    मैंने ब्लॊगिंग ब्लॊगस्पॊट में शुरू किया था। अब मेरा जॊ ब्लॊग( रजी चन्द्रशॆखर ) वॆर्ड्प्रस में है, उसी में हिन्दी प्रविष्टियाँ भी शामिल कर रहा हूँ । कृपया दॆखें और अड्वैस भी दें।

  3. Aditya  

    4:21 PM

    I really liked ur post, thanks for sharing. Keep writing. I discovered a good site for bloggers check out this www.blogadda.com, you can submit your blog there, you can get more auidence.

  4. शास्त्री जे सी फिलिप्  

    6:52 PM

    You must make at least one 200-word post per week here. Do not keep this blog idle. It can be a great link between English and Hindi -- Shastri

  5. बृजेश चोरोटिया
    (BRIJESH CHOROTIA)
     

    1:56 PM

    धर्म की हकीकत - उड़ीसा में अत्याचार

    धर्म, इंसानियत के नाम पर गाली बनता जा रहा है। सिर्फ धर्म के नाम पर हिंदू-मुस्लिम दंगे होते हैं तो धर्म के नाम पर हिंदुत्ववादी इंसानों का खून बहाने और उनके आराधनास्थलों को तोड़ने, जलाने या क्षति पहुँचाने से बाज़ नहीं आते।

    मैं भी हिंदू हूँ, पर मुझे इस बात में कतई कोई औचित्य समझ नहीं आता कि निरीह इंसानों को मौत के घाट उतारकर कौन सा सदकर्म हम करते हैं। उड़ीसा में हो रहे अत्याचार के पीछे दिये गये विहिप और भाजपा के कुछ नेताओं के बयान कुछ ऐसे हैं कि वे (ईसाई) हमारे मंदिरों को तोड़ रहे हैं, हमारे लक्ष्मी गुरूजी को मार डाला। पहली बात तो मैं इस बात से सहमत ही नहीं हुँ कि ईसाईयों ने लक्ष्मी जी का खून किया, परंतु अगर किसी ने एक गलती की तो हमको कौन सा गलती करने का लाइसेंस मिल जाता है। उसके अलावा एक व्यक्ति की मृत्यु के बदले सैंकड़ों लोगों पर अत्याचार करना, गर्भवती महिलाओं को दौड़ाना कि उनका गर्भ ही गिर जाये, महिलाओं और बच्चों तक को मारना और डराना कि उन्हें जंगलों में शरण लेनी पड़े, नन और एक व्यक्ति को जिंदा जला देना, यह सब कहाँ का न्याय है। यदि मंदिरों को तोड़ा जा रहा है तो फिर उसकी खबर क्यों नहीं बनती, जबकि चर्चों के जलाये जाने की, उन पर पत्थर फेंकने की, सत्संग कर रहे लोगों के साथ मारपीट करने की, खबरें आम हो गई हैं।

    क्या ईश्वर इससे सच में खुश हो रहा होगा? अगर आप सोचते हैं कि ईश्वर हमारे अंदर रहता है तो एक व्यक्ति की धर्म के नाम पर हत्या करके आप क्या सोचते हैं, आप ईश्वर के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। क्या आप सोचते हैं कि आप मोक्ष का मार्ग तय कर रहे हैं? पाप और पुण्य की बात करने वाले हम किस चौराहे पर खड़े हैं कि हमें सही मार्ग दीख ही नहीं पड़ रहा। धर्म को छोड़कर कुछ देर हम इंसानियत की बात क्यों न करें।

    राजनैतिक दलों को तो मुद्दों की ज़रूरत है, उनके बहाव में आकर आम आदमी का कत्ल करना क्या सही है? वे तो कीचड़ को हाथ में लेकर अपने भी लगाते हैं और दूसरों के भी। फिर अपने आप को साफ करके निकल लेते हैं और दूसरों पर उनके किये के निशान पड़े रहते हैं। भारत एक लोकतांत्रिक देश है, परंतु यहाँ प्रजातंत्र की धुरी (प्रजा) को ही नाश किया जा रहा है। धर्मनिरपेक्ष भारत की कौन सी परिभाषा डॉ. अम्बेड़कर हमारे संविधान में देकर गये थे और कौन सी परिभाषा का पालन हम कर रहे हैं?

    क्या ऐसे ही होगा - मेरा भारत महान?
    क्या ऐसे ही लुटती रहेगी अस्मत इंसानियत की?
    क्या ऐसे ही धर्म का दानव रोंदता रहेगा मानवीयता को?
    क्या ऐसे ही अंधे, बहरे और गूंगे होकर बैठे रहेंगे आप और हम?
    क्या हमारे पढ़े लिखे होने का यही फायदा है कि अनपढ़ नेता हमारी अगुवाई करें?